Ratan Singh Aswal https://ratansinghaswal.com Influential Figure Wed, 05 Mar 2025 13:27:32 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.8.3 https://i0.wp.com/ratansinghaswal.com/wp-content/uploads/2024/03/cropped-EDUCATIONMATTERS-3.png?fit=32%2C32&ssl=1 Ratan Singh Aswal https://ratansinghaswal.com 32 32 231550182 उत्तराखंड: अस्मिता, संघर्ष और संरक्षण की पुकार https://ratansinghaswal.com/%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%8d/ https://ratansinghaswal.com/%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a4%82%e0%a4%a1-%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%8d/#respond Wed, 05 Mar 2025 13:27:32 +0000 https://ratansinghaswal.com/?p=732 उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक विचार है—संघर्ष, शौर्य और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक। यह केवल पहाड़ों की श्रृंखलाओं और नदियों की धाराओं से बना भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि उन असंख्य बलिदानों और परंपराओं का केंद्र है, जिन्होंने इसे गढ़ा है। यहां की धरती ने देवताओं की कथाओं को सुना है, ऋषियों के तप को सहा है और वीरों के रक्त से सींची गई है।

संघर्ष और बलिदान की भूमि

उत्तराखंड के इतिहास पर नजर डालें तो यह केवल प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध नहीं, बल्कि संघर्षों और बलिदानों की भूमि भी रहा है। प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक चंद्र और कत्यूरी राजवंशों ने यहां शासन किया, जो इस भूमि की स्वायत्तता और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहां के वीरों ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर किए, और 1990 के दशक में उत्तराखंड आंदोलन के दौरान माताओं और बहनों ने अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी।

मुजफ्फरनगर कांड जैसी हृदयविदारक घटनाएं इस संघर्ष की पीड़ा को आज भी जीवंत रखती हैं। उत्तराखंड राज्य केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, यह उन पहाड़ियों की संकल्प शक्ति और बलिदान का प्रतिफल था, जिन्होंने अपनी पहचान और अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया।

संस्कृति और परंपरा का गौरव

उत्तराखंड की पहचान उसकी लोकसंस्कृति, परंपराओं और लोकगीतों में बसती है। जागर, पांडव नृत्य, बग्वाल और रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इस भूमि के गौरवशाली अतीत का जीवंत दस्तावेज हैं। यहां के मंदिर—केदारनाथ, बद्रीनाथ, जागेश्वर, नैनी देवी—सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक चेतना के केंद्र हैं।

गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाएं केवल बोलियां नहीं, बल्कि इस राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, इन पर भी बाहरी प्रभाव और आधुनिकता का ऐसा दबाव बढ़ रहा है कि नई पीढ़ी अपनी ही भाषा से दूर होती जा रही है।

बाहरी अतिक्रमण और सांस्कृतिक संकट

उत्तराखंड आज एक नए संकट से जूझ रहा है—बाहरी पूंजीवादी ताकतों का अतिक्रमण। कुछ वर्षों से यहां की भूमि को केवल एक “रियल एस्टेट हब” के रूप में देखा जाने लगा है। बड़े-बड़े उद्योगपति और व्यापारी यहां की जमीनें खरीद रहे हैं, उन्हें महंगे रिसॉर्ट्स और होटलों में बदल रहे हैं। यह न केवल पारंपरिक जीवनशैली को प्रभावित कर रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों को उनके ही गांवों से विस्थापित कर रहा है।

जनसंख्या संतुलन में अनियंत्रित बदलाव केवल सांस्कृतिक संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर मुद्दा है। चीन और नेपाल की सीमाओं से सटे इस राज्य में यदि बाहरी लोगों की अनियंत्रित बसावट होती रही, तो यह देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है।

कृषि और पशुपालन: पहाड़ की रीढ़

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि और पशुपालन रहा है। पारंपरिक कृषि प्रणाली यहां की जलवायु और पारिस्थितिकी के अनुरूप विकसित हुई है। मंडुवा, झिंगोरा, चौलाई, लाल चावल जैसे मोटे अनाज न केवल पोषण का स्रोत हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ने में भी सक्षम हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में कृषि को दरकिनार किया जा रहा है। पहाड़ों से पलायन बढ़ रहा है, खेत बंजर होते जा रहे हैं, और बाहरी प्रभावों के कारण पारंपरिक खेती पीछे छूट रही है। सरकारी नीतियों को इस ओर ध्यान देना होगा कि कृषि को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए, किसानों को नए अवसर दिए जाएं, और जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाए।

पशुपालन और दुग्ध उत्पादन:


पहाड़ों में पशुपालन एक अहम भूमिका निभाता है। बद्री गाय जैसी देशी नस्लें यहां की जैव विविधता और अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। उत्तराखंड में दुग्ध उत्पादन की संभावनाएं अपार हैं, लेकिन इसे संगठित और तकनीकी रूप से उन्नत करने की आवश्यकता है। आधुनिक डेयरी फार्मिंग, सहकारी दुग्ध समितियों और जैविक उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देकर इसे आर्थिक रूप से मजबूत किया जा सकता है।

आधुनिकीकरण और सतत विकास की जरूरत

उत्तराखंड का विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा नहीं कि वह राज्य की आत्मा को ही नष्ट कर दे। अनियंत्रित शहरीकरण, जंगलों की कटाई और बाहरी अतिक्रमण से यह राज्य धीरे-धीरे अपनी मूल पहचान खो रहा है। यदि इसे नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा उत्तराखंड मिलेगा, जहां न तो जैव विविधता बचेगी और न ही वहां के लोगों की पारंपरिक आजीविका।

  1. स्मार्ट खेती: ड्रोन, आईओटी और एआई जैसी तकनीकों को जोड़कर किसानों को सशक्त बनाया जा सकता है।
  2. पर्यावरणीय पर्यटन: उत्तराखंड पर्यटन का केंद्र है, लेकिन इसे ऐसा बनाया जाए जो पर्यावरण और संस्कृति को नुकसान न पहुंचाए।
  3. स्थानीय उद्योग: हथकरघा, जैविक उत्पाद, पारंपरिक शिल्प और जड़ी-बूटी उद्योगों को बढ़ावा देकर स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।

संरक्षण और संतुलित विकास की आवश्यकता

विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा नहीं कि वह उत्तराखंड की आत्मा को ही नष्ट कर दे। अनियंत्रित शहरीकरण और जंगलों की कटाई से राज्य का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं। यदि यही हाल रहा, तो आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा उत्तराखंड मिलेगा, जहां न तो जैव विविधता बचेगी और न ही यहां की पारंपरिक पहचान।

राज्य के विकास के लिए आवश्यक है कि स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं, पहाड़ी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जाए, और पर्यटन को इस तरह विकसित किया जाए कि यह स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण को क्षति न पहुंचाए।

उत्तराखंड: संघर्ष जारी रहेगा

उत्तराखंड केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, यह उन लोगों की मातृभूमि है, जिन्होंने इसे अपने खून-पसीने से सींचा है। यहां के लोग अपने जंगलों, नदियों, पहाड़ों और संस्कृति को किसी भी कीमत पर नष्ट नहीं होने देंगे। यदि आवश्यकता पड़ी, तो वे फिर से अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करेंगे।

यह राज्य उन सभी का स्वागत करता है, जो इसकी पहचान और संस्कृति का सम्मान करते हैं, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि उत्तराखंड केवल एक व्यापारिक अवसर नहीं, बल्कि एक विरासत है। यह केवल कुछ पूंजीपतियों की जागीर नहीं, बल्कि उन सभी की धरोहर है, जो इसकी अस्मिता को संजोए रखना चाहते हैं।

उत्तराखंड संघर्ष से बना है, और यदि इसे बचाने के लिए एक नई लड़ाई लड़नी पड़ी, तो यह भूमि एक बार फिर उसी साहस और आत्मसम्मान के साथ खड़ी होगी, जैसा उसने सदियों से किया है।

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उच्च हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण-अनुकूल शहरी विकास: उत्तराखंड के संदर्भ में प्रभाव, चुनौतियाँऔर सततसमाधान https://ratansinghaswal.com/%e0%a4%89%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%af%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/ https://ratansinghaswal.com/%e0%a4%89%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%af%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/#respond Wed, 05 Mar 2025 11:58:14 +0000 https://ratansinghaswal.com/?p=702 1. परिचय

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में हाल के दशकों में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज़ी से बढ़ी है। पर्यटन, बुनियादी ढांचे के विकास और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार ने इस क्षेत्र में सामाजिक और आर्थिक विकास को गति दी है। हालांकि, यह अनियोजित शहरीकरण पारिस्थितिकीय संतुलन को प्रभावित कर रहा है, जिससे पर्यावरणीय गिरावट, प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण और स्थानीय समुदायों पर विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव पड़ रहे हैं।

यह अध्ययन उच्च हिमालयी क्षेत्र में शहरी विकास के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण करता है और सतत शहरी विकास के लिए रणनीतियों का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।

2. अनुसंधान उद्देश्य

यह शोध निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों पर केंद्रित है:

  1. पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन: वनों की कटाई, जल संकट, मिट्टी के कटाव और जैव विविधता की हानि का विश्लेषण।
  2. सामाजिकसांस्कृतिक प्रभावों की पहचान: स्थानीय समुदायों के विस्थापन, पारंपरिक ज्ञान की हानि और जनसंख्या दबाव का अध्ययन।
  3. सतत विकास के लिए रणनीतियों का प्रस्ताव: पर्यावरण-अनुकूल शहरीकरण के लिए नीतिगत और तकनीकी समाधान सुझाना।

3. अध्ययन क्षेत्र और अनुसंधान पद्धति

3.1 अध्ययन क्षेत्र

अध्ययन उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों, विशेष रूप से चार धाम मार्ग (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री) और अन्य प्रमुख शहरीकृत पर्वतीय कस्बों जैसे जोशीमठ, औली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी पर केंद्रित है।

3.2 अनुसंधान पद्धति

इस अध्ययन में मिश्रित-पद्धति दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिसमें गुणात्मक और मात्रात्मक डेटा संग्रह शामिल हैं:

  1. मैदान सर्वेक्षण: स्थानीय समुदायों, पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं से साक्षात्कार।
  2. रिमोट सेंसिंग और GIS तकनीक: भूमि उपयोग परिवर्तन, वनों की कटाई और जल निकायों की स्थिति का विश्लेषण।
  3. आंकड़ों का विश्लेषण: सरकारी रिपोर्ट, सैटेलाइट डेटा और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अध्ययन।

4. शहरी विकास के पर्यावरणीय प्रभाव

4.1 वनों की कटाई और जैव विविधता की हानि

  • बुनियादी ढांचे और पर्यटन के विस्तार के कारण बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हो रही है।
  • इससे वन्यजीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं, जिससे हिमालयी कस्तूरी मृग, हिम तेंदुआ और अन्य प्रजातियों के अस्तित्व को खतरा है।

4.2 जल संकट और जल संसाधनों का क्षरण

  • अनियंत्रित निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं के कारण नदी प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है।
  • भूजल स्तर में गिरावट और ग्लेशियरों के पिघलने से स्थानीय जल स्रोतों पर संकट उत्पन्न हो रहा है।

4.3 भूस्खलन और मिट्टी का कटाव

  • अनियोजित सड़क निर्माण और पहाड़ों की कटाई भूस्खलन को बढ़ावा दे रही है, जिससे आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है।
  • 2013 की केदारनाथ आपदा इसी पारिस्थितिक असंतुलन का एक उदाहरण थी।

4.4 वायु और ध्वनि प्रदूषण

  • बढ़ते पर्यटन, वाहनों और निर्माण कार्यों से वायु गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
  • धार्मिक स्थलों और पर्यटन केंद्रों पर ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ा है, जो जैव विविधता और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।

5. शहरी विकास के सामाजिकसांस्कृतिक प्रभाव

5.1 स्थानीय समुदायों का विस्थापन

  • विकास परियोजनाओं और बढ़ती शहरीकरण दर से ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन हो रहा है।
  • स्थानीय लोगों की आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, जिससे उनकी पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हुई है।

5.2 पारंपरिक वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत पर खतरा

  • आधुनिक निर्माण पद्धतियों के बढ़ते उपयोग से पारंपरिक वास्तुकला विलुप्त हो रही है।
  • धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के व्यावसायीकरण से स्थानीय सांस्कृतिक मूल्यों पर प्रभाव पड़ रहा है।

5.3 पर्यटन के सामाजिक प्रभाव

  • बढ़ता पर्यटन स्थानीय संस्कृति को व्यावसायिक बना रहा है और मूल निवासियों की जीवनशैली को बदल रहा है।
  • धार्मिक पर्यटन स्थलों पर सामाजिक संघर्ष और बढ़ते शहरीकरण से अवैध निर्माण को बढ़ावा मिल रहा है।

6. सतत शहरी विकास के लिए रणनीतियाँ

6.1 हरित भवन और ऊर्जाकुशल बुनियादी ढांचा

  • पारंपरिक वास्तुकला के साथ हरित भवन प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना।
  • सौर ऊर्जा और हाइड्रोपावर को प्राथमिकता देना।

6.2 सतत पर्यटन और पारिस्थितिक पर्यटन

  • पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन मॉडल विकसित करना।
  • पर्यटकों की संख्या को सीमित करने के लिए नियम लागू करना।

6.3 भूमि उपयोग और जोनिंग नियमों का पालन

  • निर्माण कार्यों को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम लागू करना।
  • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्र घोषित करना।

6.4 अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली

  • ठोस और जैविक कचरे के लिए एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली विकसित करना।
  • प्लास्टिक प्रतिबंध और कचरा पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना।

6.5 समुदाय भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग

  • स्थानीय समुदायों को निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में शामिल करना।
  • पारंपरिक ज्ञान और सतत आजीविका मॉडल को प्रोत्साहित करना।

6.6 नीतिगत ढांचा और वित्तीय प्रोत्साहन

  • सतत परियोजनाओं के लिए सरकारी सब्सिडी और वित्तीय सहायता।
  • जलवायु अनुकूलन योजनाओं को लागू करना।

7. जलवायु परिवर्तन और शहरी विकास का संबंध

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे परिवर्तनों का शहरीकरण पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसमें शामिल हैं:

  • ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना: इससे जल संसाधनों पर दीर्घकालिक संकट उत्पन्न हो सकता है।
  • अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की घटनाएं: अनियंत्रित शहरीकरण के कारण जल निकासी प्रणाली कमजोर हो जाती है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ता है।
  • तापमान में वृद्धि और मौसम का अनिश्चितता: यह कृषि और स्थानीय पारिस्थितिक प्रणालियों को प्रभावित करता है, जिससे जीवनयापन पर प्रभाव पड़ता है।

8. आधुनिक शहरी नियोजन और तकनीकी नवाचार

हिमालयी क्षेत्रों में पारिस्थितिक रूप से संतुलित शहरी नियोजन के लिए कुछ प्रमुख तकनीकी पहलुओं को अपनाया जा सकता है:

  • स्मार्ट सिटीज और GIS आधारित प्लानिंग: भूमि उपयोग, जल निकासी, और निर्माण गतिविधियों की प्रभावी निगरानी के लिए।
  • जल संरक्षण तकनीक: रेनवाटर हार्वेस्टिंग, झीलों एवं जलाशयों के पुनर्जीवन पर ध्यान देना।
  • हिमालयी अनुकूल भवन निर्माण तकनीक: जैसे कि पारंपरिक वास्तुकला को आधुनिक डिज़ाइनों में सम्मिलित करना, जिससे ऊर्जा कुशलता बनी रहे।

9. सामाजिक सहभागिता और नीतिनिर्माण में स्थानीय योगदान

स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना कोई भी सतत विकास योजना सफल नहीं हो सकती। कुछ प्रमुख कदम:

  • स्थानीय ग्राम सभाओं और पंचायतों की भूमिका बढ़ाना।
  • पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय विशेषज्ञों को शामिल करना।
  • स्थानीय लोगों को सतत पर्यटन और हरित व्यवसायों में शामिल कर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।

10. निष्कर्ष और भविष्य की दिशा

शहरी विकास को सतत और पर्यावरणीय रूप से अनुकूल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि नीति निर्माण में एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया जाए। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित होगा, बल्कि स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि भी बनी रहेगी।

प्रस्तावित अनुशंसाएँ

  1. पर्यावरण-अनुकूल भवन और ऊर्जा दक्षता: हरित निर्माण सामग्री और पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला को बढ़ावा देना।
  2. पर्यावरण-हितैषी परिवहन प्रणाली: सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना और निजी वाहनों की संख्या को सीमित करना।
  3. स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना: उनकी भागीदारी से नीति निर्माण और योजना क्रियान्वयन में सुधार लाना।
  4. पर्यावरणीय शिक्षा और जागरूकता अभियान: स्थानीय नागरिकों और पर्यटकों को सतत विकास के महत्व के बारे में शिक्षित करना।

इस अध्ययन में प्रस्तुत रणनीतियाँ न केवल उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लिए बल्कि अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बन सकती हैं। यदि इन सिफारिशों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए, तो यह क्षेत्र दीर्घकालिक रूप से पर्यावरण-संवेदनशील और सामाजिक-आर्थिक रूप से संतुलित शहरी विकास को प्राप्त कर सकता है।

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